समाजवाद एक ऐसी विचारधारा है जिससे आधुनिक कल में सनाज को एक नया आवाम दिया | उनीसवीं शताव्दी में औधोयगीक क्रांति के स्वरूप समाज में पूंजी पति वर्गों द्वारा मजदूरों का लगतार शासन अपने प्रथम सिमा पर था | उन्हें इस सोसन के विरुद्ध आबाज उठाने तथा वर्ग विहीन समाज की स्थापना करने में समाजवादी विचारधारा ने अग्नि भूमिका अदा की
समाजवाद उत्पादन में मुख्यता निजी स्वामित्व की जगह सामूहिक स्वामित्व था धन के सामान वितरण पर जोर देता हे | यह एक षोषण उन्मुक्त समाज की स्थापना चाहते हे | अतः व्यवस्था एक ऐसी अर्थव्यवस्था हे जिसके अंतर्गत के सभी संधानो कारखानों तथा विप्रन में सरकर का अकधिकार हो | ऐसा व्यवस्था में उत्पाद निजी लाभ के न होकर सरे समाज के लिए होता हे |

समाजवाद की उत्पति :
समाजबादी एवं साम्यवाद :
समाजवाद भावन का उदय मुलता 18 वी शताव्दी में औधोगिक क्रांति के के अनुसार हुआ था | औधोगिक क्रांति ने सभी देशो की आर्थिक वयवस्था में आमूल परिवर्तन कर दिया था |
कुटीर उधोग धंधो का स्थान पर विशाल पैमाने पर उधोग के मशीनीकरण थता पूंजीवादी भावना के विकास के फल सवरूप यूरोप के विभिन देश में धीरे धीरे पूंजीपतियों के निहित स्वार्थो और मिल मालिकों की श्रीमिक बिरोधी नीतियों के कारन सभी सभी देश के श्रीमिको का जीवन नारकिय बन गया था |
उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति निरंतर गिरने लगी थी श्रीमिको को कोई अधिकार नहीं था और क्रूर शासन हो रहा था | इस प्रकार औधोगिक क्रांति से प्रभाबित देशो में दो परस्पर विरोधी तथा एक साथ दिखाई दे रहे थे |
पूंजीवादी वयवस्था दिन प्रतिदिन मजबूत होती जा रही थी |
मध्यम वर्ग आर्थिक आधार पर निरंता समृद्धशाली होता जा रहा था दुत्यक श्रीमिको आर्थिक स्थिति का तेजी से पतन हो रहा था इस प्रकार उत्पादन की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण घटक भूखे मरने को बाध्य था
आखो के निगरानी में समृध्दशाली
मजदूरों को अपने श्रीम ससंगठन बनाने का भी अधिकार नहीं था मजदुर वर्ग पूरी तरह पूँजीपतियों की दया पर जीवित था इस प्रकार कहा जाता हे की आर्थिक दृष्टि से समाज का विभाजन दो वर्गों में हो गया था |
(1)पूंजीपति वर्ग
(2) श्रीमिक वर्ग
जिसमे समय श्रीमिक जगत आर्थिक दुर्दश और सामाजिक पतन की स्थिति गुजर रहा था ,
उसी समय श्रमिकों को कुछ महत्वपूर्ण राष्ट्रीय भावातों विचारों को लिखो को मार्ग्शील प्राप्त
इन व्यक्तियों ने सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक नवीन विचारधारा का प्रतिपादित किया जिससे समाजवादी ने नाम से जाना जाता है महान विचारों ने यूरोपियन देशों में प्रचलित आर्थिक व्यवस्था की कड़ी आलोचना की थी
यूरोपियन देशों में प्रचलित आर्थिक व्यवस्था की कड़ी आलोचना की तथा औद्योगिक संगठन और पूंजीवादी एवं श्रमिकों को पारस्परिक संवर्धन को विश्व में नवनीत सिद्धांतों पर प्रतिपादित किया ऐतिहासिक दृष्टि से आधुनिक समाजवादी का विचारधारा विभाजन दो प्रकार में किया जाता हैमहान विचारों ने यूरोपियन देशों में प्रचलित आर्थिक व्यवस्था की कड़ी आलोचना की थी
ऐतिहासिक दृष्टि से आधुनिक समाजवाद का विभाजन दो चरणों में किया जाता है- मार्क्स से पूर्व का समाजवाद एवं मार्क्स के पश्चात् का समाजवाद। मार्क्सवादी विचारकों ने इन्हें क्रमशः यूटोपियन एवं वैज्ञानिक समाजवाद का नाम दिया। यूटोपियन समाजवादियों की दृष्टि आदर्शवादी थी तथा उनके कार्यक्रम की प्रकृति अव्यवहारिक थी। अधिकतर यूटोपियन विचारक फ्रांसीसी थे जो क्रांति के बदले शांतिपूर्ण परिवर्तन में विश्वास रखते थे अर्थात वे वर्ग संघर्ष के बदले वर्ग समन्वय के हिमायती थे।ऐतिहासिक दृष्टि से आधुनिक समाजवाद का विभाजन दो चरणों में किया जाता है- मार्क्स से पूर्व का समाजवाद एवं मार्क्स के पश्चात् का समाजवाद। मार्क्सवादी विचारकों ने इन्हें क्रमशः यूटोपियन एवं वैज्ञानिक समाजवाद का नाम दिया। यूटोपियन समाजवादियों की दृष्टि आदर्शवादी थी तथा उनके कार्यक्रम की प्रकृति अव्यवहारिक थी। अधिकतर यूटोपियन विचारक फ्रांसीसी थे जो क्रांति के बदले शांतिपूर्ण परिवर्तन में विश्वास रखते थे अर्थात वे वर्ग संघर्ष के बदले वर्ग समन्वय के हिमायती थे।
यूरोपियन समाजवादी
राबर्ट ओवन
प्रथम यूटोपियन (स्वप्नदर्शी) समाजवादी, जिसने समाजवादी विचारधारा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, एक फ्रांसीसी विचारक सेंट साइमन था । उसका मानना था कि राज्य एवं समाज को इस ढंग से संगठित करना चाहिए कि लोग एक दूसरे का शोषण करने के बदले मिलजुल कर प्रकृति का दोहन करें, समाज को निर्धन वर्ग के भौतिक एवं नैतिक उत्थान के लिए कार्य करना चाहिए। उसने नोपित किया ‘प्रत्येक को उसकी क्षमता के अनुसार तथा प्रत्येक को उसके कार्य के अनुसार’। आगे यही समाजवाद का मूलभूत नारा बन गया।
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