गाजियाबाद के हरीश राणा की इच्छामृत्यु का मामला : पूरी जानकारी सरल शब्दों में
यह मामला न केवल एक परिवार के दर्द की कहानी है, बल्कि भारत में सम्मानपूर्वक मृत्यु (Right to Die with Dignity), मानवता, कानून और चिकित्सा नैतिकता से जुड़ा एक बहुत बड़ा प्रश्न भी है। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा पिछले 12–13 वर्षों से कोमा जैसी अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच फंसे हुए हैं। उनके माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट से अपने बेटे के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति मांगी है।
1.हरीश राणा कौन हैं?
हरीश राणा उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले हैं। वर्ष 2013 में वे चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रहे थे। उसी दौरान वे एक दुर्घटना का शिकार हो गए। बताया जाता है कि वे एक इमारत की चौथी मंज़िल से गिर गए, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट लगी।
इस हादसे के बाद:
हरीश कोमा/वेजेटेटिव स्टेट में चले गए
आज तक उन्हें होश नहीं आया
वे खुद से न बोल सकते हैं, न चल सकते हैं, न कुछ समझ सकते हैं
आज हरीश की उम्र लगभग 31–32 वर्ष है, लेकिन वे पिछले 12–13 सालों से बिस्तर पर पड़े हुए हैं।
2.हरीश की वर्तमान मेडिकल स्थिति
डॉक्टरों और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार:
हरीश का दिमाग लगभग काम नहीं कर रहा
वे अपने शरीर पर कोई नियंत्रण नहीं रखते
उन्हें ट्यूब के ज़रिये खाना दिया जाता है
सांस और अन्य ज़रूरी प्रक्रियाएं मशीनों और देखभाल पर निर्भर हैं
डॉक्टरों ने कहा है कि रिकवरी की कोई वास्तविक संभावना नहीं है
अदालत को बताया गया कि हरीश की स्थिति अरुणा शानबाग केस से भी अधिक गंभीर है।

हरीश के माता-पिता इस पूरे मामले का सबसे दर्दनाक हिस्सा हैं।
वे बूढ़े हो चुके हैं
वर्षों से बेटे की देखभाल कर रहे हैं
इलाज में घर, ज़मीन, जमा पूंजी सब खत्म हो चुकी है
मां ने कोर्ट में कहा कि:
“मैं रोज़ अपने बेटे को तड़पते देखती हूं, अब मुझसे नहीं देखा जाता।”
उनका कहना है कि:
हरीश का जीवन अब सम्मानजनक नहीं रहा
वे सिर्फ जिंदा रखे जा रहे हैं
यह जीवन नहीं, बल्कि लगातार पीड़ा है
इसी कारण उन्होंने बेटे के लिए इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी।
4.इच्छामृत्यु क्या होती है?
इच्छामृत्यु का अर्थ है — ऐसी स्थिति में मृत्यु की अनुमति देना, जहां व्यक्ति:
असहनीय पीड़ा में हो
ठीक होने की कोई उम्मीद न हो
केवल मशीनों के सहारे जीवित रखा जा रहा हो
इच्छामृत्यु के दो प्रकार होते हैं:
(1) सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia)
दवा या इंजेक्शन देकर मृत्यु देना
यह भारत में गैरकानूनी है
(2) निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)
जीवन रक्षक उपकरण (Life Support) हटाना
इलाज बंद करना
यह कुछ शर्तों के साथ कानूनी है
👉 हरीश राणा के मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की मांग की गई है, न कि सक्रिय।
5.मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा? – गाजियाबाद के हरीश राणा इच्छामृत्यु मामले
हरीश के माता-पिता ने:
पहले स्थानीय स्तर पर प्रयास किए
फिर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की
उनकी याचिका में कहा गया कि:
बेटा वर्षों से बेहोश है
कोई सुधार नहीं
परिवार शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से टूट चुका है
बेटे को सम्मानपूर्वक मृत्यु का अधिकार मिलना चाहिए
6.सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ? -गाजियाबाद के हरीश राणा इच्छामृत्यु मामले
सुप्रीम कोर्ट ने:
मामले की विस्तृत सुनवाई की
मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट मंगवाई
माता-पिता, डॉक्टर और सरकार की दलीलें सुनीं
केंद्र सरकार का पक्ष:
सरकार ने कहा कि
निष्क्रिय इच्छामृत्यु हत्या नहीं है
ऐसे मामलों में मरीज की गरिमा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए
कोर्ट की स्थिति:
कोर्ट ने माना कि यह भावनात्मक और संवेदनशील मामला है
कोर्ट ने फिलहाल फैसला सुरक्षित (Reserve) रख लिया है
यानी अंतिम निर्णय अभी आना बाकी है
7.यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह केस इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि:
यह भारत में इच्छामृत्यु कानून को और स्पष्ट कर सकता है
यह तय करेगा कि
“क्या सिर्फ सांस चलना ही जीवन है?”
यह लाखों ऐसे मरीजों और परिवारों की आवाज़ है
जो वर्षों से पीड़ा झेल रहे हैं
यह मामला:
मानवाधिकार
चिकित्सा नैतिकता
कानून और करुणा
इन तीनों के संतुलन की परीक्षा है
8.समाज में दो तरह की राय
समर्थन में लोग कहते हैं:
बेहोश शरीर को ज़िंदा रखना अमानवीय है
गरिमा के साथ मरने का अधिकार मिलना चाहिए
परिवार की पीड़ा भी देखी जानी चाहिए
विरोध में लोग कहते हैं:
जीवन ईश्वर की देन है
इच्छामृत्यु से दुरुपयोग हो सकता है
इससे गलत मिसाल बनेगी
गाजियाबाद के हरीश राणा इच्छामृत्यु मामले
9.आगे क्या होगा?
अब सबकी निगाहें:
सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर हैं
अगर कोर्ट अनुमति देता है:
यह भारत में इच्छामृत्यु मामलों के लिए नई दिशा तय करेगा
अगर अनुमति नहीं देता:
बहस और संघर्ष जारी रहेगा
निष्कर्ष
हरीश राणा का मामला सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह सवाल है:
क्या जीवन सिर्फ सांस लेने का नाम है,
या सम्मान, चेतना और गरिमा भी ज़रूरी है?
उनके माता-पिता अपने बेटे को मारना नहीं चाहते,
वे सिर्फ उसकी पीड़ा खत्म करना चाहते हैं।
अब यह निर्णय न्यायालय के हाथ में है कि
भारत में सम्मानपूर्वक मृत्यु को कितनी जगह दी जाएगी।







